सहु सहु सहु बाबु सहनै नसके पनि - सम
sayapatri

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June 21, 2006

मदिरालय


शाम एक मन्दिर नित जाता था, आज भगवान उठ गये
मदिरालय का मुझे रास्ता पता था, आज कदम उठ गये

मदिरालय

आज बदला सा था माहौल मदिरालय का,
हवा मे निशान था विचित्र प्रलय का,
दर्द था लावारीस, हर पग प्रणव आलय था,
आज मेला जीने वालो का था,
दिवस पीने वालो का था,
लोक आनन्द समाहित हर घूँट, नशा बाकी न था,
आज कर लिया मदिरापान साकी ने था

a poem by khoye






















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