मदिरालय
शाम एक मन्दिर नित जाता था, आज भगवान उठ गये
मदिरालय का मुझे रास्ता पता था, आज कदम उठ गये
आज बदला सा था माहौल मदिरालय का,
हवा मे निशान था विचित्र प्रलय का,
दर्द था लावारीस, हर पग प्रणव आलय था,
आज मेला जीने वालो का था,
दिवस पीने वालो का था,
लोक आनन्द समाहित हर घूँट, नशा बाकी न था,
आज कर लिया मदिरापान साकी ने था
a poem by khoye


